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atul61


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अखंड भारत की कल्पना

Posted On: 3 Jan, 2016  
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संसद सत्र या राजनेतिक भ्रस्टाचारियों का सम्मेलन

Posted On: 25 Dec, 2015  
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कानून , समाज व राजनेतिक प्रभाव

Posted On: 19 Dec, 2015  
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विकास में वाधक जनसँख्या वृधि

Posted On: 10 Nov, 2015  
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बिहार चुनाव के परिणाम

Posted On: 9 Nov, 2015  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

जय श्री राम अतुल जी बहुत अच्छा सार्थक लेख लिखा अंग्रेजो के आने के पहले गुल्कुलो में दी जानी वाली शिक्षा मूल्यों और चरित्र पर आधारित थी लेकिन आज़ादी के बाद भी अन्ग्रेज़ोकी शिक्षा को न बदलने से ऐसा हो रहा हम लोग अंधे हो कर पच्छिम की नक़ल कर रहे उनकी अच्छी आदते न सीख कर गलत आदते सीख रहे वैलेंटाइन डे भारतीय संस्कृति के खिलाफ है औत वैलेंटाइन का सन्देश इस प्रेम के लिए नहीं था जो सडको में क्झुले आम दिखया जा रहा इनको प्रचारित करने में बड़ी कम्पनिएस (mnc) की चाल है जो करोडो का व्यापार करके ख़राब कर रहे कुछ महिला संगठन भी व्यक्ति की आजादी के नामं पर ऐसा कर रहे है कभी लव किस की भी वकालत करते है पता नहीं देश के युवा कहा जा रहे वहां के लोगो से अनुशाशन,राजनीती नैतिकता नहीं सीखते टीवी,सिनेमा इन्टरनेट ने और बर्बाद कर दिया हम लोग लिखते रहेंगे परन्तु सुधर की उम्मीद नहीं .लेख के लिए साधुवाद.इस फोरम में भी हमारे बुद्धीजीवी लोग इतने बेपरवाह की प्रर्तिक्रिया देने का भी कष्ट नहीं उठाठे.

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

अतुल जी, सादर अभिवादन । वैसे धर्म या कर्म कांड के नाम पर महिलाओं के साथ भेदभाव को उचित नही माना जा सकता । लेकिन सवाल यहां यह भी है कि यही महिलाएं विग़्य़ापनों के माध्यम से महिलाओं दवारा परोसी जा रही अश्लीलता के विरूध्द कुछ नही बोल रहीं । फिल्मों मे भी महिलाएं हद दरजे का देह प्रदर्शन कर रही हैं और यह सब पैसों व शोहरत के लिए । यहां ' हल्ला बोल " नही हो रहा । सिर्फ आस्था के सवालों पर ही सवाल उठा कर यह किस सशक्तिकरण की वकालत कर रही हैं । दर-असल वोट की राजनीति के तहत भी महिला जाप को बढावा दिया जा रहा है । यह सशक्तिकरण सिर्फ शहरों तक सीमित है । गांव कस्बों की महिलाओं पर तो यह महिला संगठन और झंडाबरदार बिल्कुल खामोश हैं । जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

मोबाइल में पैनिक बटन , मातृत्व अवकाश में बढ़ोतरी व मृत्यु प्रमाणपत्र में विधवा के नाम की अनिवार्यता आदि योजनायें तो सरकारी आवश्यकताएं हैं जिन्हें सरकार कर रही है I बेटी और बेटे में अंतर करने वाली मानसिकता समाज से समाप्त करनी है I बेटी और बेटे में अंतर करने वाली मानसिकता यदि समाप्त हो जाये तो कुछ भी नहीं बचेगा नारी के वास्ते करने को I नारी तो पुरुष से सबल है जो पुरुष को विकट प्रसव पीड़ा सहकर जन्म देती है I उसकी सहनशीलता व ममत्व ने पुरुष को सबल होने का गुमान करा दिया है ई आदरणीय अतुल जी, आपने ज्वलंत मुद्दे को उठाया है दरअसल समाज ही इसे दूर कर सकता है ...बहुत सुन्दर लेख और सोच के लिए आपका अभिनंदन!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

के द्वारा: deepak pande deepak pande




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