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भारतीय राजनीती के सबसे सादगी भरे चरित्र श्री लाल बहदुर शास्त्री जी की पुण्यतिथि पर श्रद्धI सुमन

Posted On: 11 Jan, 2016 Junction Forum में

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11 जनवरी, 1966 भारत के महान सपूत देश के दूसरे प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का ताशकंद में रहस्यमयी परिस्थितियों में निधन I आज उनकी 50वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ I
2 अक्टूबर 1904 को जन्मे लाल के पिता उत्तरप्रदेश के मुगलसराय में अध्यापक श्री शारदा प्रसाद के पुत्र थे I इस महान सपूत के ऊपर से 1906 में पिता का साया भी उठ गया I शास्त्रीजी ने अपना पूरा जीवन ईमानदारी,नैतिकता और निष्ठा के साथ गरीबी में बिताया I देश की स्वतंत्रता के लिए 4 बार जेल यात्रा करने वाला लाल 13, मई 1952 को केंद्र में रेल तथा परिवहन मंत्री बना व रेल दुर्घटना होने पर 7 दिसम्बर 1956 को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद से त्यागपत्र दे दिया I 27 मई 1964 को देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु जी के निधन के बाद 9, जून 1964 को देश की बागडोर दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में संभाली I वे भले प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँच गए पर उनका रहन सहन पूर्वी उत्तर प्रदेश के मध्यवर्गीय लोगों की तरह था I उनकी पत्नी ललिता शास्त्री मोटी धोती पहनती और लोगों से भोजपुरी में बतियाती I सदा जीवन की प्रतिमूर्ति थे पति पत्नी और विचार एक दम दृढ I
अपने 17 माह के प्रधानमंत्रित्व काल में शास्त्री जी ने पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध का बहुत ही कौशल के साथ नेतृत्व किया व देश में चल रहे खाद्य संकट से निबटने में भी अभूतपूर्व सामर्थय का परिचय दिया I जय जवान जय किसान का नारा देकर उन्होनें देश में अभूतपूर्व उत्साह की लहर दौड़ा दी I पाकिस्तान के सैन्य बल व अमेरिकन पाटों टैंक के गरूर को तोड़ने के बाद उन्होनें 10, जनवरी 1966 को अपनी दृढता व सदाशयता का परिचय देते हुए ताशकंद घोषणा में कहा कि “राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय कैसे भी विवादों को निपटाने में शक्ति का प्रयोग नहीं होना चाहिए I हर स्थिति में हम इस आदर्श का पालन करना चाहते हैं I हमें बाध्य होकर बलप्रयोग करना पड़ा , और हमें इस बात का खेद है I” यह सलाह केवल हमारे लिए ही नहीं बल्कि उन सभी देशों के लिए थी जो हथियारबंदी कर रहे थे I
ऐसे दृढ व सादा विचारों के थे हमारे लाल बहादुर शास्त्री जी I गरीबी को करीब से देखे होने के कारण वे किसान , भूमिहीन किसान , खेतिहर मजदूर व अन्य लोगों की परेशानियों से भलीभांति परचित थे I इतने सरल कि प्रधानमंत्री होने के वाबजूद वो 300 की आबादी वाले गुजरात प्रान्त के छोटे से गाँव अजरपुरा में रात्रि में रुके और गाँव वालों के साथ घूमे फिरे भी I सबसे बड़ी उनकी उपलब्धि है हरित क्रांति का आगाज़ व देश को दूध में आत्म निर्भर बनाना I भारत की राजनीती के दो स्तम्भ महात्मा गाँधी जी व पंडित जवाहर लाल नेहरु जी जहाँ धनाढ्य परिवारों में जन्मे थे वही शास्त्री जी ने अपना ज्यादातर जीवन गरीबी में बिताया था Iसंयमी और स्वाभिमानी इतने कि सरकारी पद का इस्तेमाल न अपने लिए और न ही किसी मित्र या बंधू के लिए किया I राजनीती में वंश परम्परा को पोसना तो बहुत दूर की बात है I
संयोग से साल 2015 पाकिस्तान से हुए हमारे दूसरे युद्ध की 50 वीं सालगिरह रही I यह युद्ध अगर हमारे लिए आत्म गौरव का परिचायक है तो इसके प्रतीक पुरुष लाल बहादुर शास्त्री जी हैं I जब हम इस युद्ध की पचासवीं बरसी उतसाह के साथ मना सकते हैं तो युद्ध के नायक श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की 50 वीं पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित करने में देशवासी व सरकार पीछे क्यों ?आएं देश के ईमानदार राजनेता को उसकी 50वीं पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित करें I
ऐसे नैतिक व ईमानदार प्रधानमंत्री शास्त्री जी को शत शत नमन I



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